Calendar Spread Margin Changes Understanding in Zerodha | सिंगल स्टॉक डेरिवेटिव्स पर ज़ेरोधा का नया मार्जिन नियम क्या है?

फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में ट्रेडिंग करने वाले ज़्यादातर ट्रेडर्स मार्जिन बेनिफिट (Margin Benefit) पाने के लिए हेजिंग (Hedging) स्ट्रेटेजीज़ का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से सबसे लोकप्रिय स्ट्रेटेजी है Calendar Spread (कैलेंडर स्प्रेड)। लेकिन हाल ही में एक्सचेंज (NSE) और Zerodha जैसे ब्रोकर्स ने सिंगल स्टॉक डेरिवेटिव्स (Single Stock Derivatives) के कैलेंडर स्प्रेड मार्जिन नियमों में कुछ बड़े बदलाव किए हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह नियम क्या है और इससे आपकी ट्रेडिंग पर क्या असर पड़ेगा।

कैलेंडर स्प्रेड (Calendar Spread) क्या होता है?
कैलेंडर स्प्रेड एक ऐसी हेजिंग स्ट्रेटेजी है जिसमें आप एक ही अंडरलाइंग एसेट (जैसे Reliance या Nifty) का एक कॉन्ट्रैक्ट वर्तमान महीने (Current Month) की एक्सपायरी का खरीदते/बेचते हैं, और उसी एसेट का दूसरा कॉन्ट्रैक्ट अगले महीने (Next Month) की एक्सपायरी का खरीदते/बेचते हैं। चूंकि इसमें जोखिम (Risk) हेज हो जाता है, इसलिए एक्सचेंज आपको भारी मार्जिन बेनिफिट (छूट) देता है।


1. सिंगल स्टॉक डेरिवेटिव्स पर नया मार्जिन नियम क्या है?

पहले, जब आप किसी स्टॉक (जैसे HDFC Bank, Reliance) में कैलेंडर स्प्रेड बनाते थे, तो आपको एक्सपायरी के दिन तक पूरा मार्जिन बेनिफिट मिलता रहता था। लेकिन अब एक्सपायरी वीक (Expiry Week) यानी एक्सपायरी वाले सप्ताह में फिजिकल डिलीवरी (Physical Delivery) के रिस्क को देखते हुए मार्जिन के नियम बदल दिए गए हैं।

नया नियम (New Rule):
एक्सपायरी सप्ताह के दौरान (अंतिम कुछ दिनों में), एक्सचेंज सिंगल स्टॉक डेरिवेटिव्स के कैलेंडर स्प्रेड पर मिलने वाले मार्जिन बेनिफिट को धीरे-धीरे वापस ले लेता है। इसका मतलब है कि एक्सपायरी के पास आते ही आपके अकाउंट में अतिरिक्त मार्जिन (Additional Margin) की आवश्यकता होगी, और अगर आपके खाते में पर्याप्त फंड नहीं हुआ तो आपकी पोज़िशन ब्रोकर द्वारा Auto-Square Off (स्क्वायर ऑफ) की जा सकती है।

2. यह बदलाव क्यों किया गया? (Physical Delivery Risk)

सेबी (SEBI) के नियमों के अनुसार, इंडेक्स (Nifty, BankNifty) की एक्सपायरी ‘Cash Settled’ होती है, जबकि स्टॉक्स (Single Stocks) की एक्सपायरी Physical Settlement के ज़रिए होती है।

  • मान लीजिए आपने रिलायंस (Reliance) का इस महीने का फ्यूचर बेचा (Short) है और अगले महीने का फ्यूचर खरीदा (Long) है।
  • यदि आप इस महीने के शॉर्ट फ्यूचर को एक्सपायरी तक स्क्वायर ऑफ नहीं करते हैं, तो आपको रिलायंस के शेयर्स की फिजिकल डिलीवरी (Physical Delivery) देनी पड़ सकती है, जिसके लिए आपके पास करोड़ों रुपये का मार्जिन होना चाहिए।
  • इस बड़े जोखिम से ब्रोकर्स और ट्रेडर्स को बचाने के लिए ही एक्सपायरी वीक में कैलेंडर स्प्रेड से मार्जिन बेनिफिट हटा लिया जाता है।

नोट: यदि आप नए हैं और आपको मालूम नहीं कि F&O कैसे चालू करें, तो आप Zerodha में F&O Activate कैसे करें की जानकारी पढ़ सकते हैं।


3. ट्रेडर्स को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

अगर आप स्टॉक ऑप्शंस या फ्यूचर्स में कैलेंडर स्प्रेड बनाते हैं, तो आपको एक्सपायरी से पहले इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:

1. समय से पोज़िशन रोलओवर (Rollover) करें: एक्सपायरी वीक शुरू होने से पहले ही (यानी एक्सपायरी वाले गुरुवार से 2-3 दिन पहले) अपनी Current Month की पोज़िशन को स्क्वायर ऑफ कर दें या उसे अगले महीने में रोलओवर कर लें।

2. अकाउंट में एक्स्ट्रा फंड रखें: यदि आप अपनी पोज़िशन को एक्सपायरी के करीब तक ले जाना चाहते हैं, तो सुनिश्चित करें कि आपके Zerodha अकाउंट में पर्याप्त Margin Funding या कैश उपलब्ध हो, ताकि मार्जिन पेनल्टी (Margin Penalty) न लगे।

3. इंडेक्स में यह नियम लागू नहीं होता: राहत की बात यह है कि Nifty, BankNifty और FinNifty जैसे इंडेक्स डेरिवेटिव्स कैश-सेटल्ड होते हैं। इसलिए इंडेक्स के कैलेंडर स्प्रेड में एक्सपायरी के दिन तक कोई अतिरिक्त फिजिकल डिलीवरी मार्जिन नहीं लगता।


निष्कर्ष (Conclusion)

Zerodha और एक्सचेंज का Calendar Spread Margin में बदलाव का उद्देश्य ट्रेडर्स को फिजिकल सेटलमेंट (Physical Settlement) के भारी जोखिम से बचाना है। एक स्मार्ट ट्रेडर के रूप में, आपको स्टॉक डेरिवेटिव्स में एक्सपायरी वाले सप्ताह से पहले ही अपनी स्प्रेड पोज़िशन्स को एडजस्ट कर लेना चाहिए। हमेशा ट्रेड लेने से पहले Zerodha Margin Calculator का उपयोग करके एक्सपायरी वीक के मार्जिन की जांच अवश्य कर लें।


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डिस्क्लेमर (Disclaimer): शेयर बाजार और फ्यूचर एवं ऑप्शंस (F&O) में ट्रेडिंग अत्यधिक जोखिम भरा है। यह लेख केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी प्रकार की हेजिंग या ट्रेडिंग पोज़िशन लेने से पहले अपने प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से सलाह अवश्य लें।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

नहीं, Nifty और BankNifty जैसे इंडेक्स कैश सेटल्ड (Cash Settled) होते हैं, इसलिए इनकी एक्सपायरी पर कोई फिजिकल डिलीवरी नहीं होती। इंडेक्स के कैलेंडर स्प्रेड में एक्सपायरी वीक के दौरान मार्जिन नहीं बढ़ता। यह नियम केवल सिंगल स्टॉक्स पर लागू होता है।

यदि एक्सपायरी वीक में मार्जिन बेनिफिट हटने के बाद आपके Zerodha अकाउंट में पर्याप्त फंड (Margin Shortfall) नहीं हुआ, तो आपकी पोज़िशन ऑटोमैटिकली स्क्वायर ऑफ (Square-off) की जा सकती है और आप पर मार्जिन पेनल्टी भी लग सकती है।

स्टॉक ऑप्शंस और फ्यूचर्स में एक्सपायरी के दिन यदि आपकी पोज़िशन इन-द-मनी (ITM) रहती है, तो आपको वास्तव में उस कंपनी के शेयर (लॉट साइज़ के बराबर) खरीदने या बेचने पड़ते हैं। इसे ही फिजिकल सेटलमेंट कहा जाता है।

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